
Lakshmi Ganesh Saraswati Pujan
लक्ष्मी गणेश सरस्वती पूजा क्या है?
लक्ष्मी, गणेश और सरस्वती पूजा एक विशेष महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है जो मुख्य रूप से किसी शुभ कार्य के प्रारंभ के समय किया जाता है| यह पूजा समृद्धि (लक्ष्मी), बुद्धि (सरस्वती), और बाधा नाशक (गणेश) जी के आशीर्वाद के लिए की जाती है|
यह एक संयुक्त पूजा है जिसमें तीन प्रमुख देवी-देवताओं की आराधना की जाती है:
भगवान गणेश –: शुभारंभ के देवता, विघ्न विनाशक |
माता लक्ष्मी –: धन, वैभव और समृद्धि की देवी |
माता सरस्वती –: ज्ञान, संगीत, विद्या और कला की देवी|
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यह अनुष्ठान लक्ष्मी जी से धन और समृद्धि का आशीर्वाद पाने के लिए किया जाता है |
गणेश जी से नए कामों की सफलता और विघ्नों के निवारण हेतु किया जाता है |
और माता सरस्वती जी से बुद्धि, शिक्षा और विवेक की प्राप्ति हो उसके लिए किया जाता है |
लक्ष्मी गणेश सरस्वती पूजा का प्रयोजन क्या है ?
लक्ष्मी, गणेश और सरस्वती पूजा का प्रयोजन बहुत ही गहरा और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण भी है| यह अनुष्ठान केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि जीवन के तीन प्रमुख स्तंभों – धन, बुद्धि और ज्ञान – को भी संतुलित करने का एक साधना है|
लक्ष्मी, गणेश और सरस्वती पूजा का मुख्य प्रयोजन :
1. धन और समृद्धि की प्राप्ति (लक्ष्मी जी) :
माता लक्ष्मी को धन, वैभव, ऐश्वर्य और सौभाग्य की देवी माना जाता है |
पूजा का उद्देश्य यह है कि घर में आर्थिक स्थिरता, समृद्धि और शांति बनी रहे |
दीपावली आदि त्योंहारों पर विशेष रूप से लक्ष्मी,गणेश और सरस्वती पूजा जाता है जिससे लक्ष्मी जी का घर में वास होता हैं|
2. विघ्नों का नाश और सभी कार्यों का शुभारंभ :
भगवान गणेश को "विघ्नहर्ता" और "सिद्धिदाता" माना जाता है|
कोई भी शुभ कार्य उनके आशीर्वाद के बिना प्रारंभ नहीं होता |
पूजा का उद्देश्य जीवन से बाधाएँ दूर करना और सभी काम में सफलता प्राप्त करना है|
3. बुद्धि, विद्या और विवेक की प्राप्ति (सरस्वती जी) :
माता सरस्वती ज्ञान, संगीत, कला और शिक्षा की देवी हैं|
इस अनुष्ठान से व्यक्ति को विवेक, विचार शीलता और धर्म का ज्ञान प्राप्त होता है|
विद्यार्थी, कलाकार और शिक्षाविद (शिक्षक) इस अनुष्ठान के माध्यम से विशेष लाभ प्राप्त करते हैं|
आध्यात्मिक और व्यावहारिक प्रयोजन:
आध्यात्मिक मन की शुद्धि, सकारात्मक ऊर्जा और देवी-देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त करना |
व्यवसायिक / गृहस्थ आर्थिक उन्नति, कार्य में सफलता, पारिवारिक सुख-शांति|
शैक्षणिक/विद्यार्थियों और व्यस्क को बुद्धि, ज्ञान और एकाग्रता की प्राप्ति|
तीनों का संतुलन क्यों ज़रूरी है ?
केवल धन हो, किन्तु बुद्धि और विवेक न हो, तो वह धन गलत दिशा में जा सकता है|
केवल ज्ञान हो, किन्तु संसाधन न हों, तो उसका उपयोग कठिन होता है|
केवल सफलता की इच्छा हो, और विघ्नों का नाश न हो, तो मार्ग में कठिनाइयाँ आ सकती हैं|
इसलिए लक्ष्मी, गणेश और सरस्वती – तीनों की पूजा करके हम जीवन के हर क्षेत्र में संतुलन, सफलता और शांति का आवाहन करते हैं|
शास्त्रों के अनुसार लक्ष्मी गणेश सरस्वती पूजा एक साथ क्यों करना चाहिए ?
शास्त्रों के अनुसार लक्ष्मी, गणेश और सरस्वती जी की पूजा एक साथ करने का अत्यंत आध्यात्मिक और व्यावहारिक महत्व है| यह केवल परंपरा नहीं है, अपितु जीवन के तीन मूल स्तंभों – धन (लक्ष्मी), बुद्धि (सरस्वती) और सफलता (गणेश) – को एक साथ संतुलित करने का वैज्ञानिक और धार्मिक दृष्टिकोण भी है|
शास्त्रों के अनुसार लक्ष्मी-गणेश-सरस्वती की संयुक्त पूजा का कारण:
1. शुभारंभ का नियम (मंगलाचरण) – गणेश पूजन -:
शास्त्रों में लिखा है:-
"सर्वकार्येषु नायकं गणेशं पूज्यते प्रथमम्|"
किसी भी शुभ कार्य का प्रारंभ गणेश पूजन से ही किया जाता है क्योंकि वे विघ्नों का नाश करते हैं|
इसलिए सर्वप्रथम गणेश जी की पूजा की जाती है जिससे पूजा सफल हो और निर्विघ्न कार्य संपन्न हो|
2. धन की देवी लक्ष्मी – लेकिन विवेक के बिना धन व्यर्थ है :-
लक्ष्मी जी धन की देवी हैं, लेकिन शास्त्र कहते हैं कि "अविवेकी के पास धन विनाशकारी हो सकता है|"
इसलिए बुद्धि और विवेक के लिए सरस्वती की पूजा भी जरूरी है|
"लक्ष्मी स्थिरा भव" – यह मंत्र इस बात को दर्शाता है कि लक्ष्मी वहीं स्थिर होती हैं जहाँ बुद्धि और धर्म होता है|
3. ज्ञान (सरस्वती) और धन (लक्ष्मी) में संतुलन :
"विद्या ददाति विनयम्, विनयाद् याति पात्रताम्|"
ज्ञान से विनम्रता आती है और पात्रता आती है, जिससे लक्ष्मी स्थायी रूप से स्थित रहती हैं|
शास्त्रों में कहा गया है कि सरस्वती और लक्ष्मी एक साथ स्थित नहीं होती हैं, लेकिन यदि गणेश जी मध्य में हों, तो संतुलन बनता है|
इसलिए सरस्वती जी और लक्ष्मी जी की संयुक्त पूजा तब सफल मानी जाती है जब गणेश जी का आशीर्वाद पहले लिया जाए |
4. पौराणिक कथा:
पौराणिक कथा के अनुसार:-
एक बार लक्ष्मी जी ने हास्य में सरस्वती जी का अपमान कर दिया| जिससे सरस्वती जी रुष्ट हो गईं और जहां लक्ष्मी जी थीं, वहां से बुद्धि और विवेक अंतर्धान हो गया| तब देवताओं ने गणेश जी की पूजा कर दोनों लोगों को एकत्र रखने का प्रार्थना किया| फिर गणेश जी के प्रार्थना करने कर लक्ष्मी जी और सरस्वती जी गणेश जी के साथ विराजित होने लगीं तभी से यह परंपरा बन गयी कि तीनों की पूजा एक साथ होने लगी |
निष्कर्ष (शास्त्र सम्मत तर्क) :
तत्व-देवता-कारण शास्त्रों के अनुसार :-
किसी भी अनुष्ठान का प्रारंभ में विघ्न नाशक गणेश जी के पूजा से ही होता है |
भौतिक समृद्धि और सौभाग्य के प्राप्ति केलिए धन और वैभव की देवी माता लक्ष्मी की पूजा होती है |
जीवन में उचित निर्णय लेने और विवेक केलिए और लक्ष्मी को स्थिरता प्रदान करने केलिए ज्ञान की देवी माता सरस्वती की उपासना होती है |
इसलिए शास्त्रों में तीनों की एक साथ पूजा का विधान बताया गया है, विशेष रूप से दीपावली, विद्यारंभ, और व्यापारिक शुभारंभ के समय|
शास्त्रों के अनुसार लक्ष्मी-गणेश जी की पूजा क्यों करनी चाहिए
शास्त्रों के अनुसार लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा का बहुत गहरा धार्मिक, आध्यात्मिक और जीवनोपयोगी महत्व है| यह केवल परंपरा नहीं है, बल्कि यह पूजा मानव जीवन में धन, सौभाग्य, सफलता, और विघ्न विनाश के लिए अनिवार्य मानी गई है|
शास्त्रों के अनुसार लक्ष्मी और गणेश पूजा क्यों करनी चाहिए?
1. गणेश जी – विघ्नों का नाशक एवं शुभारंभ के अधिपति
शास्त्रवचन :-
"न गणेशं विना पूजां कुर्वीत कदाचन|"
(कोई भी पूजा या शुभ कार्य गणेश जी के बिना शुरू नहीं किया जाना चाहिए|)
भगवान गणेश को "विघ्नहर्ता" (विघ्नों को दूर करने वाला) और "संकटमोचक" माना गया है|
वे प्रथम पूज्य हैं, इसलिए किसी भी धार्मिक क्रिया, पर्व या कार्य की शुरुआत उनसे होती है|
पूजा से मन में एकाग्रता आती है, और कार्यों में सफलता प्राप्त होती है|
2. लक्ष्मी जी – धन, ऐश्वर्य और सौभाग्य की देवी -
शास्त्रवचन :
"या लक्ष्मीः सर्वभूतेषु विश्रुता कमलालया|"
(माता लक्ष्मी समस्त प्राणियों में ऐश्वर्य और सौंदर्य का प्रतीक हैं|)
लक्ष्मी जी की पूजा से धन, वैभव, सुख-शांति और शुभता प्राप्त होती है|
वे चंचला (स्थिर न रहने वाली) मानी जाती हैं, इसलिए उन्हें प्रसन्न रखना आवश्यक है|
शास्त्रों में कहा गया है कि :-
"लक्ष्मी स्थिरा भव" – हे माता लक्ष्मी, मेरे घर में स्थिर हो जाइए|
3. गणेश और लक्ष्मी की संयुक्त पूजा का महत्व-:
शास्त्रों और पुराणों में वर्णित है कि -:
"गणेशो लक्ष्मी-संयुक्तः पूज्यते यत्र मानवैः|
तत्र तिष्ठति नित्यं श्रीः सदा सौख्य-समन्विता||"
(जहां गणेश और लक्ष्मी जी की पूजा एक साथ की जाती हैं, वहां स्थायी सुख और लक्ष्मी जी निवास करती हैं|)
गणेश जी सद्बुद्धि और कर्मसिद्धि के प्रतीक हैं, और लक्ष्मी जी परिणाम की प्रतीक है |
दोनों की एक साथ पूजा से धन के साथ-साथ उसे सही दिशा में उपयोग करने की बुद्धि मिलती है|
4. दीपावली पर विशेष महत्व :-
दीपावली की रात्रि को लक्ष्मी जी का विशेष आवाहन कर पूजन किया जाता है क्योंकि वह रात्रि लक्ष्मी प्रकटोत्सव मानी जाती है|
इसी दिन व्यापारी वर्ग नया बही-खाता आरंभ करता है और गणेश-लक्ष्मी की पूजा करके समृद्धि की कामना करता है|
निष्कर्ष:
देवता-पूजा का उद्देश्य-शास्त्रीय आधार
गणेश जी विघ्नों का नाश, कार्यों की सिद्धि प्रथम पूज्य है और शास्त्रों में उन्हें "विघ्नेश्वर" कहा जाता है |
लक्ष्मी जी धन, ऐश्वर्य, सुख और सौभाग्य की देवी है और "श्री-सूक्त" लक्ष्मी जी की साधना करने का सबसे प्रसिद्ध सूक्त है |
इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि :-
"गणेशं पूजयित्वा तु लक्ष्मीं पूजयेत् ततः|
द्वयोरपि प्रसादेन लभते सुखमुत्तमम्||"
(अर्थ: पहले गणेश की पूजा करें, फिर लक्ष्मी की| दोनों के प्रसाद से श्रेष्ठ सुख की प्राप्ति होती है|)
लक्ष्मी, गणेश और सरस्वती जी की पूजा करने की विधि क्या है ?
लक्ष्मी, गणेश और सरस्वती जी की पूजा विशेष रूप से दीपावली, वसंत पंचमी और किसी विशेष शुभ अवसरों पर की जाती है| इन तीनों देवताओं की पूजा एक साथ करने से धन, बुद्धि और ज्ञान की प्राप्ति होती है |
सरल और पारंपरिक पूजा विधि :
पूजा से पूर्व स्नान आदि करके शुद्ध वस्त्र धारण करें (यदि संभव हो तो नए वस्त्र पहन लें )
पूजा की तैयारी :
स्वच्छता -: पूजा स्थान को स्वच्छ करें |ईशान,उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके पूजा करें |
पंचामृत : दूध, दही, घी, शहद और शक्कर मिलाकर पंचामृत तैयार करें|
पात्र : कलश, पूजा थाली, दीपक, पुष्प, धूप, कुमकुम, अक्षत, मिष्ठान, फल, नारियल आदि रखें|
पूजा विधि :-
सर्वप्रथम गणेश जी,लक्ष्मी जी और माता सरस्वती के विग्रह को एक आसन पर पीले रंग के वस्त्र पर विराजित करें |
पुनः स्वयं भी शुद्ध वस्त्र धारण कर के आसन पर बैठ जाएँ |
सर्वप्रथम शुद्धिकरण,आचमन, प्राणायाम करके धूप-दीप प्रज्ज्वलित करें |
फिर गंधाक्षत लेकर शांति पाठ करें |
1. संकल्प लें :
दाहिने हाथ में गंध अक्षत पुष्प और जल लेकर संकल्प लें :-
संस्कृत में शुद्धता हो तो सम्पूर्ण संकल्प करें | अन्यथा सूक्ष्म संकल्प करें | (यदि यह अनुष्ठान किसी ब्राह्मण (आचार्य) के माध्यम से कर रहें हो तो उनके बताये शास्त्रीय विधि से करें अन्यथा निम्न विधि से करें)
संकल्प के बाद गंध,अक्षत और पुष्प से सबका ध्यान कर आवाहन करें |
(एक पात्र में विग्रह को रखें जिससे उनको स्नान आदि सुगमता से कराया जा सके )
पुनः आसन देकर पाद्य,अर्घ्य,आचमन और स्नान कराएँ |
दूध,दधि,घृत,शक्कर,मधु आदि पञ्चामृत से भगवान को स्नान कराएँ |
पुनः विग्रह को वस्त्र आदि धारण कराएँ और अलंकारों से अलंकृत करें |
भगवान को चन्दन,कुंकुम अक्षत अर्पण करें |
पुष्पमाला अर्पण करने के बाद सिंदूर,इत्र चढ़ाएं |
धूप-दीप दिखाकर नैवेद्य अर्पण करें पुनः करोद्वर्तन,ताम्बूल और द्रव्यदक्षिणा भगवान गणेश,माता लक्ष्मी और सरस्वती जी को अर्पण करें |
प्रदक्षिणा कर | क्षमा प्रार्थना कर आगे की विधि को करें -:
लक्ष्मी,गणेश,सरस्वती पूजन के षोडशोपचार विधि के बाद मंत्र जाप और स्तोत्र का पाठ किया जाता है |
2. पञ्चांग देव स्थापना -:
यदि अनुष्ठान में विभिन्न पंचांग आदि देवताओं की भी स्थापना करनी हो तो को वेदी बनाकर उनकी भी स्थापना करें और तांबे या मिट्टी का कलश रखें, उसमें जल भरें,पंचपल्लव रख पूर्णपात्र रखें और पूर्णपात्र पर नारियल रखें |
3. वरुण आदि देवताओं की पूजा -:
गणेश पूजन की भांति ही सभी देवताओं की षोडशोपचार पूजन करना चाहिए |
जिसमे ध्यान,आवाहन,शुद्धिकरण,वस्त्र,आभूषण,गंध,अक्षत,पुष्प,धूप,दीप और नैवेद्य आदि सम्मिलित है |
पुनः क्षमा प्रार्थना कर स्तोत्र और मन्त्र का पाठ करें |
दीपक में घी या तिल का तेल ही उपयोग करें |
पूजा के बाद घर में सभी स्थानों पर दीप जलाएं |
शास्त्रों के अनुसार लक्ष्मी, गणेश और सरस्वती पूजा को कब करना चाहिए ?
शास्त्रों के अनुसार लक्ष्मी, गणेश और सरस्वती जी की संयुक्त पूजा विशेष रूप से दीपावली के दिन, विशेष मुहूर्त में की जाती है, परंतु अन्य शुभ अवसरों पर भी इनकी पूजा की जा सकती है|
उनके पूजन का शास्त्र सम्मत समय और तिथि विस्तार से बताया गया है :-
1. लक्ष्मी-गणेश-सरस्वती पूजा का श्रेष्ठ समय (शास्त्रीय अनुसार):
दीपावली (कार्तिक कृष्ण अमावस्या तिथि)
यह सबसे शुभ दिन होता है|
तिथि: कार्तिक मास की अमावस्या
मुहूर्त: प्रदोष काल और स्थिर लग्न में पूजा करना श्रेष्ठ मुहूर्त माना जाता है|
स्थिर लग्न क्यों?
स्थिर लग्न में की गई लक्ष्मी पूजा से देवी लक्ष्मी का वास स्थायी होता है, ऐसा शास्त्रों में भी कहा गया है|
2. पूजा का शुभ समय (दीपावली पर विशेष):
प्रदोष काल : सूर्यास्त के लगभग 24 मिनट बाद से 2 घंटे तक का समय|
स्थिर लग्न: जब वृषभ राशि का लग्न हो, जो अमावस्या की रात्रि में मुख्यतः सायं सूर्यास्त के बाद भी स्थिर लग्न होता है और मध्य रात्रि के समय भी |
इन दोनों की संगति का समय सर्वोत्तम होता है — इसे लक्ष्मी पूजन मुहूर्त कहते हैं|
3. अन्य शुभ अवसरों पर पूजा का समय:
वसंत पंचमी (सरस्वती पूजन हेतु विशेष) :
माघ मास की शुक्ल पंचमी तिथि-
इस दिन सरस्वती माता की पूजा विशेष रूप से की जाती है, परंतु साथ में गणेश और लक्ष्मी का पूजन भी किया जा सकता है|
शरद पूर्णिमा: इस दिन रात्रि को चंद्रमा पूर्ण होता है, और मां लक्ष्मी को विशेष रूप से पूजा जाता है|
धनतेरस (दीपावली से दो दिन पूर्व):-
इस दिन भी लक्ष्मी और धन्वंतरि देव की पूजा होती है, और गणेश जी का स्मरण किया जाता है|
शास्त्रीय मान्यता :-
गणेश जी को पहले पूजना अनिवार्य होता है, क्योंकि वे विघ्नहर्ता हैं|
उसके बाद लक्ष्मी और फिर सरस्वती जी का पूजन करें|
इससे धन, विद्या और सफलता तीनों का संतुलन प्राप्त होता है|
लक्ष्मी-गणेश पूजा एक अत्यंत पवित्र और शुभ अनुष्ठान है, जिसे विशेष रूप से दीवाली, धनतेरस, या किसी व्यापार के शुभआरंभ के समय किया जाता है| इस पूजा का धार्मिक, मानसिक और भौतिक रूप से अनेक लाभ होते हैं| यहाँ इसके मुख्य लाभ बताए गए हैं:-
लक्ष्मी-गणेश पूजा के लाभ:-
1. धन-संपत्ति और समृद्धि की प्राप्ति :-
माँ लक्ष्मी धन, वैभव और समृद्धि की देवी हैं| उनकी कृपा से घर में आर्थिक स्थिति भी बलशाली होती है|
व्यापार और नौकरी में उन्नति होती है|
2. विघ्नों का नाश और कार्यों में सफलता :-
भगवान गणेश "विघ्नहर्ता" कहे जाते हैं| उनकी पूजा से सभी कार्य निर्विघ्न संपन्न होते हैं|
नए कार्य को प्रारंभ में बाधाएँ नहीं आतीं|
3. घर में सुख-शांति और सौभाग्य का वास :-
पूजा से घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है|
पारिवारिक मतभेद समाप्त होकर परस्पर प्रेम में वृद्धि होती है|
4.कर्ज़ और आर्थिक संकट से मुक्ति :-
नियमित लक्ष्मी-गणेश पूजा करने से पुराने ऋण और आर्थिक बाधाओं से मुक्ति मिलता है|
5. बुद्धि, विवेक और निर्णय लेने की शक्ति में वृद्धि :-
भगवान गणेश विद्या और बुद्धि के देवता हैं| उनकी कृपा से निर्णय लेने की क्षमता दृढ होती है|
विद्यार्थी हो व्यापारी हो या गृहस्थ सभी के लिए लाभकारी|
6. कर्मों की शुद्धि और आत्मिक शांति :-
विधिपूर्वक अनुष्ठान करने से मानसिक शांति मिलती है|
आत्मा शुद्ध और पवित्र होती है, जो जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाता है|
7. वास्तु दोष और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा :-
लक्ष्मी-गणेश और सरस्वती पूजा करने से घर का वातावरण शुद्ध होता है|
नकारात्मक उर्जाओं , दृष्ट दोष आदि का प्रभाव कम होता है|
विशेष अवसर पर पूजा करने के अतिरिक्त लाभ :-
दीवाली पर पूजा करने से सम्पूर्ण वर्ष घर में लक्ष्मी माता का वास होता हैं|
व्यवसाय प्रारम्भ करने से पूर्व गणेश लक्ष्मी और सरस्वती माता के पूजन करने पर व्यापार में उन्नति होती है|
गृह प्रवेश या वाहन क्रय जैसे अवसरों पर पूजा करने से सुख-समृद्धि भी बनी रहती है|
लक्ष्मी गणेश और सरस्वती पूजन में क्या -क्या दान करना चाहिए ?
लक्ष्मी, गणेश और सरस्वती पूजन विशेष रूप से दीपावली, विद्या आरंभ, व्यापार आरंभ, या किसी शुभ कार्य के अवसर पर किया जाता है| इन देवताओं की पूजा धन, बुद्धि, विद्या, और समृद्धि के लिए की जाती है| अतः पूजा के अंतराल दान (अर्थात् पुण्य के लिए समर्पण) का भी विशेष महत्व होता है|
लक्ष्मी, गणेश और सरस्वती पूजन में क्या-क्या दान करना चाहिए :-
1. धन की देवी लक्ष्मी जी के लिए दान :-
दान की वस्तु का महत्व :-
श्वेत वस्त्र (साड़ी या धोती) शुद्धता और शांति का प्रतीक |
चांदी के सिक्के लक्ष्मी का प्रतीक; समृद्धि के लिए |
घी, शक्कर, चावल समृद्ध जीवन के लिए |
कमलगट्टा, बताशे लक्ष्मी पूजन में प्रिय |
कन्याओं को मिष्ठान व वस्त्र देवी लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है |
अन्न, वस्त्र और धन गरीबों को दान — सबसे श्रेष्ठ |
2. गणेश जी के लिए दान :-
दान की वस्तु महत्व
दूर्वा घास, मोदक गणेश जी को प्रिय |
हल्दी, सुपारी,मंगल के लिए शुभ |
पीले वस्त्र,सुख, शुभता और सकारात्मकता के लिए |
विद्यार्थी को , पुस्तकें गणेश जी “विद्या और विवेक” के दाता हैं |
गणेश जी के पूजन होने से बेसन के लड्डू प्रसाद में अर्पण व दान दोनों ही किया जाता है |
3. सरस्वती माता के लिए दान:
सरस्वती पूजन में दान की वस्तु महत्व :-
विद्यार्थियों को पुस्तकें , कलम, कॉपियाँ ज्ञान का दान सबसे बड़ा माना जाता है |
श्वेत वस्त्र शुद्धता और विद्या का प्रतीक है |
संगीत वाद्ययंत्र (प्रतीकात्मक) सांस्कृतिक और कला प्रेमियों के लिए शुभ |
विद्यार्थियों को शिक्षा सामग्री सरस्वती पूजन में यह श्रेष्ठ माना गया है |
गायों को चारा (हरा घास) ब्रह्मविद्या की ऊर्जा को जाग्रत करता है |
अन्य सामान्य और पुण्यदायी दान :
दीपक, मिट्टी के बर्तन, तांबे के पात्र
तिल, गुड़, चावल, आटा
गरीबों को अन्न, वस्त्र, कम्बल
मंदिर में दीपदान
गौ सेवा (गौशाला में चारा आदि का दान)
दान करते समय ध्यान रखने योग्य बातें:
दान सदैव श्रद्धा और विनम्रता से ही करें|
दान में सात्त्विक वस्तुएँ (जैसे अन्न, वस्त्र, धन) श्रेष्ठ मानी जाती हैं|
कन्याओं, ब्राह्मणों, विद्यार्थियों और निर्धनों को दान करना विशेष फलदायी होता है|
"दक्षिणा सहित दान" शुभ माना जाता है (दान के साथ यदि संभव हो तो कुछ राशि भी दें)|
शुभ मंत्र (दान करते समय बोलने योग्य):-
"यत् किञ्चिद् दत्तं धर्मार्थं तत् सर्वं श्रीमहालक्ष्म्यै समर्पयामि|"
(अर्थ:- जो भी कुछ मैंने धर्म के लिए दान किया है, वह सब माता लक्ष्मी को समर्पित है|)
